राजधानी दिल्ली के सरकारी स्कूलों के आंकड़ों के अनुसार साल 2016 में बड़ी संख्या में लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया. स्कूल बंद करने वाली लड़कियों में अधिकतर लड़कियां गरीब मजदूर परिवारों से थीं. लेकिन क्या आपको पता है कि गरीबी के अलावा लड़कियों के स्कूल छोड़ने की जो सबसे बड़ी वजह सामने आई वह थी, टॉयलेट की उचित व्यवस्था न होना.

जी हाँ! यह सच हैं, और इस वज़ह से स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों में सबसे ज्यादा 11 से 12 साल की लड़कियां देखने को मिली. इस उम्र में लड़कियों के पीरियड्स शुरू होते हैं और स्कूल में टॉयलेट की उचित व्यवस्था न होने के कारण उन्हें बहुत परेशानी होती है. लड़कियों की इस परेशानी को ध्यान में रखते हुए गुड़गांव में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली दो लड़कियों ने एक नई शुरूआत की है और उसे ‘सशक्त’ नाम दिया है.

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गुड़गांव के श्री राम स्कूल में 11वीं कक्षा की छात्रा सरन्य दास शर्मा और आमिया विश्वनाथन ने यह सराहनीय शुरुआत की है. उन्होंने एक अखबार में छपे लेख से पता चला कि पीरियड्स और साफ-सफाई की सुविधा की कमी से लड़कियों को सबसे ज्यादा स्कूल छोड़ना पड़ रहा है. लड़कियों की इस परेशानी को दूर करने के लिए उन्होंने साथ मिलकर योजना बनाई.

उन्होंने अपनी पढ़ाई के बीच से समय निकालकर सरकारी स्कूलों में पीरियड्स के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए वर्कशॉप आयोजित किए, और लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन भी उपलब्ध कराए. इस तरह से दो स्कूली लड़कियों ने मिलकर प्रोजेक्ट सशक्त की शुरुआत की.

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सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली गरीब लड़कियों के लिए पैड की व्यवस्था करने के अलावा वो दोनों पर्यावरण की समस्याओं  भी ध्यान रखती हैं.

उन्होंने लड़कियों और महिलाओं के लिए बायोडिग्रेडेबल पैड्स की व्यवस्था की है. उनके द्वारा सितम्बर 2016 से दिल्ली में यह शुरुआत की गई. कुछ ही महीनों में उनकी इस मजबूत पहल के बारे में जानकर कई NGO’s ने उनसे मदद की पेशकश कर चुके हैं. वो अबतक 200 से अधिक लड़कियों की मदद कर चुकी हैं और अब वो इसे बढ़ाकर 1,000 करना चाहती हैं.

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