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भारतीय सेना ने कई मौर्चों पर अपने शौर्य और साहस का परिचय दिया है। यही वजह है कि जब भी भारतीय सैनिकों की बात होती है तो हर देशवासी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी से पहले ही भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के सामने अपनी ताकत और शौर्य का लोहा मनवा लिया था। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने कभी उन वीर जवानों  को याद ही नहीं किया। आज हम आपको उसी युद्ध की गाथा बताने जा रहे हैं।

हम बात कर रहे हैं प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़े भारतीय सैनिकों की। उस वक्त भारतीय सेना बेल्जियम की तरफ से लड़ी थी। इस युद्ध को बैटल ऑफ याप्रेस के नाम से जाना जाता है। प्रथम विश्व युद्ध में याप्रेस की बैटल का इतिहास तो मौजूद है, लेकिन बेल्जियम की तरफ से लड़े भारतीय सैनिकों के बारे में बहुत कम ही लिखा गया है। इस युद्ध में लाखों भारतीय सैनिक विषम परिस्तिथियों में भी रणभूमी टिके रहे थे। ये युद्ध अक्टूबर के महीने में लड़ा गया था और उस वक्त कड़ाके की ठंड पड़ रही थी।

बैटल ऑफ याप्रेसयही नहीं ब्रिटश सेना तो वहां राशन तक पहुंचाने में नाकामयाब रही थी। उन्हें तो बस ब्रिटिश ने अपने सैनिकों को बचाने को बचाने के लिए ढ़ाल की तरह इस्तेमाल किया था। इसके बावजूद भी वह अपने मोर्चे पर डटे रहे। अब सवाल यह भी उठता है कि जब परिस्थितियां इतनी विपरीत थी, तो भारतीय सैनिकों ने क्यों अंग्रजों का साथ दिया। दरअसल, इसके पीछे सबसे बड़ी वजह थी आजादी। उन्हें अंग्रेजों ने सपना दिखाया था कि अगर वह इस प्रथम विश्व युद्ध जीतने में उनकी सहायता करेंगे तो वह भारत को आजाद कर देंगे।  द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना से जुड़े कुछ ऐसे सीक्रेट्स जिनसे अब तक अनजान होंगे आप

बैटल ऑफ याप्रेसभले ही वे बैटल ऑफ याप्रेस में हार गए हों लेकिन उनकी शौर्य के किस्से आज भी बेल्जियम में सुनने को मिलते हैं।आश्चर्य की बात तो ये है कि याप्रेस के युद्ध के 103 साल बाद भारतीय सैनिकों की याद किया गया है। कुछ दिनों पहले बेल्जियम के राजा फ्लिप्पे और रानी मटील्डे ने भारतीय सैनिकों के इस महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें याद करते श्रद्धांजली दी थी। इससे पहले किसी भी इतिहासकार ने उनके योगदान को कमतर करके ही आंका था। ये उन हजारों सैनिकों के बलिदान के साथ खिलवाड़ के जैसा है जो वहीं मारे गए और विदेशों में ही दफना दिए गए।

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